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पिपरिया का इतिहास मां महाकाली, 50 साल पहले चबूतरे पर विराजती थीं, आज भव्य मंदिर में उमड़ते हैं श्रद्धालु

 

पिपरिया का इतिहास मां महाकाली,

50 साल पहले चबूतरे पर विराजती थीं,

आज भव्य मंदिर में उमड़ते हैं श्रद्धालु




नवरात्र में दूर-दूर से दर्शन करने पहुंचते हैं भक्त, दशहरे के दिन हवन की अनूठी परंपरा

छगन कुशवाहा 

पिपरिया। रेलवे गेट स्थित श्री महाकाली मंदिर करीब 50 वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। कभी यहां नवरात्र के नौ दिनों के लिए चबूतरे पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती थी। समय के साथ लोगों की श्रद्धा और सहयोग से इस स्थान का विकास हुआ और आज यहां मां महाकाली का स्थायी मंदिर स्थापित है। नवरात्र के दौरान शहर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन करने पहुंचते हैं।


स्थानीय निवासी एवं महाकाली समिति रेलवे गेट के अध्यक्ष तरुण सिलावट ने बताया कि शुरुआती दौर में कोरी परिवार, छिपा परिवार और समिति से जुड़े लोग मिलकर नवरात्र में मां की प्रतिमा स्थापित करते थे। उस समय मंदिर का स्वरूप छोटा था, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था गहरी थी। धीरे-धीरे मंदिर का निर्माण हुआ और इसका विस्तार होता गया। तरुण सिलावट ने बताया कि उनके पूर्वज भी यहां पुजारी के रूप में पूजा-पाठ करते थे। पिछले करीब 35 वर्षों से शिवकुमार व्यास मंदिर में स्थायी पुजारी के रूप में सेवा दे रहे हैं।


दशहरे पर हवन की विशेष परंपरा


श्री महाकाली मंदिर की एक खास परंपरा दशहरे के दिन होने वाला हवन है। आमतौर पर कई मंदिरों में नवमी पर हवन किया जाता है, लेकिन रेलवे गेट स्थित इस मंदिर में दशहरे के दिन हवन होता है। समिति अध्यक्ष तरुण सिलावट के अनुसार, इसके पीछे धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। नवरात्र के दौरान शहर में विभिन्न समितियों द्वारा माता की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। पूजा-अर्चना के दौरान जाने-अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थना के भाव से यहां नवरात्र के समापन पर हवन किया जाता है।


नवरात्र में लगती है श्रद्धालुओं की भीड़


नवरात्र के दिनों में मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। शहर के अलावा आसपास के गांवों से भी श्रद्धालु मां महाकाली के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। मंदिर में वर्षों से चली आ रही पूजा-पाठ की परंपरा आज भी कायम है। करीब पांच दशक पहले चबूतरे पर शुरू हुई आराधना आज एक स्थायी मंदिर का स्वरूप ले चुकी है। श्रद्धालुओं की आस्था, स्थानीय लोगों के सहयोग और धार्मिक परंपराओं ने श्री महाकाली मंदिर को पिपरिया के प्रमुख आस्था केंद्रों में स्थान दिलाया है। दशहरे पर होने वाला हवन इस मंदिर की विशिष्ट पहचान बना हुआ है।





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