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घोटालों के दलदल में डूबी नर्मदापुरम की पंचायतें:सादे लेटर पैड पर निकल रहे लाखों रुपये, रामभरोसे ग्रामीण विकास और आंखें मूंदे बैठा प्रशासनिक तंत्र!

 

घोटालों के दलदल में डूबी नर्मदापुरम की पंचायतें:सादे लेटर पैड पर निकल रहे लाखों रुपये, रामभरोसे ग्रामीण विकास और आंखें मूंदे बैठा प्रशासनिक तंत्र!

नर्मदापुरम // केसला की घाटली और माखननगर की मोहासा पंचायत में कच्चे बिलों और बिना जीएसटी पर्चियों पर चल रहा है खुला खेल; क्या जिला पंचायत से लेकर जनपद के इंजीनियरों और अधिकारियों की मिलीभगत से लुट रहा है शासकीय खजाना? नाहरकोला और ढाबाकलां जैसे पुराने मामलों पर भी प्रशासनिक चुप्पी से खड़े हो रहे हैं गंभीर सवाल।



विशेष समाचार रिपोर्ट / ब्यूरो इन्वेस्टिगेशन

नर्मदापुरम (मप्र):

मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था अब जनहित और विकास का जरिया न रहकर, शासकीय खजाने को लूटने का संगठित माध्यम बनती जा रही है। जिले की ग्राम पंचायतों से लेकर जनपद और जिला पंचायत स्तर तक फैले प्रशासनिक भ्रष्टाचार का एक ऐसा काला सच उजागर हुआ है, जो शासन-प्रशासन के सुशासन के दावों की धज्जियां उड़ा रहा है। ताजा मामले जनपद पंचायत केसला के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत घाटली और माखननगर (बाबई) के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत मोहासा के हैं, जहां नियमों, अधिनियमों और वित्तीय प्रावधानों को ताक पर रखकर सादे लेटर पैड और गैर-जीएसटी कच्ची पर्चियों पर लाखों रुपये के भुगतान धड़ल्ले से आहरित कर लिए गए हैं।



लेटर पैड पर मनमाने भुगतान: कागजी घोड़े और खुली लूट

नर्मदापुरम जिले में इन दिनों वित्तीय नियमों की ऐसी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।

घाटली पंचायत में मिष्ठान (मगज़ लड्डू) और मुरम/मिट्टी भाड़े के नाम पर बिना किसी वैध जीएसटी नंबर या फर्म के, साधारण हाथों से लिखी पर्चियों पर भारी-भरकम राशि निकाल ली गई।  



मोहासा पंचायत में सीमेंट, रेंत, मेटल और आरसीसी पाइप के क्रय के नाम पर मनमाने बिल पास किए गए, जिन पर पंचायत सचिव और सरपंच के हस्ताक्षर तो मौजूद हैं, लेकिन धरातल पर गुणवत्ता और भौतिक सत्यापन (Physical Verification) पूरी तरह नदारद है।  

सवाल यह उठता है कि यदि कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से सादे कागज या दुकान के लेटर पैड पर कुछ भी लिखकर बिल थमा दे और पंचायत प्रतिनिधि उस पर आंख मूंदकर मुहर लगा दें, तो क्या कल को कोई भी व्यक्ति अपनी दुकान के पैड पर करोड़ों का वारा-न्यारा कर लेगा? यह कौन सा न्याय संगत और वैधानिक तरीका है? बिना इंजीनियर की तकनीकी जांच और बिना भौतिक सत्यापन के ऐसे बिलों को पास करना सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता और गबन की श्रेणी में आता है।



 नाहरकोला और ढाबाकलां: वे पुराने जख्म, जिन पर शासन ने डाल दी मिट्टी

यह भ्रष्टाचार कोई छिटपुट या नया मामला नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। जिले की ग्राम पंचायत नाहरकोला में पूर्व में ₹17 लाख से अधिक का बड़ा वित्तीय घोटाला और ग्राम पंचायत ढाबाकलां में ₹2.5 लाख से अधिक की हेरफेर के मामले पहले ही उजागर हो चुके हैं। इन दोनों पंचायतों के मामलों को लेकर मीडिया और जमीनी स्तर पर पूर्व में भी दर्जनों बार खुलासे हो चुके हैं, और इन पर खबरें भी प्रकाशित की जा चुकी हैं।


लेकिन विडंबना यह है कि इतनी बड़ी वित्तीय अनियमिताओं और स्पष्ट सबूतों के बावजूद शासन-प्रशासन ने गहरी नींद ओढ़ रखी है। जब-जब ऐसे प्रकरण सामने आते हैं, शुरुआती लीपापोती के बाद फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है और आज दिनांक तक न तो इन पुराने मामलों में किसी दोषी अधिकारी या मुख्य आरोपी को जेल हुई है और न ही कोई कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई देखने को मिली है।

अभियंता, जनपद और जिला पंचायत की संदिग्ध भूमिका: क्या सब हैं साझीदार?

मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम के तहत किसी भी निर्माण कार्य या सामग्री क्रय के लिए उपयंत्री (Sub-Engineer), सहायक यंत्री (AE), जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) और जिला पंचायत स्तर के अधिकारियों की तकनीकी स्वीकृति (TS), प्रशासनिक स्वीकृति (AS) और निरंतर मॉनिटरिंग अनिवार्य होती है।



बिना इंजीनियर के मैदानी सत्यापन और बिना स्टॉक रजिस्टर में इंद्राज के यदि लाखों के बिल पास हो रहे हैं, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि अभियंता से लेकर जनपद और जिला पंचायत के शीर्ष अधिकारियों की सक्रिय या मौन मिलीभगत इसके पीछे है।

यदि जिला पंचायत और जनपद के अधिकारी अपने वैधानिक दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करते, तो इस तरह के फर्जी और कच्चे बिल कभी पास ही नहीं हो सकते थे। लेकिन विडंबना यह है कि निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक बैठे अधिकारी इस भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रहे हैं।

पूरे जिले में घोटालों का सैलाब, और प्रशासन की चुप्पी

जब सिर्फ दो-तीन पंचायतों में ही लाखों-करोड़ों की बंदरबांट खुलेआम हो रही है, तो संपूर्ण नर्मदापुरम जिले की सैकड़ों पंचायतों में कुल कितने करोड़ रुपये का चूना शासन को लगाया जा चुका होगा, इसका सटीक अनुमान लगाना फिलहाल डरावना है। ग्रामीण जब इन मामलों की शिकायतें जिला कलेक्टर, संभागीय आयुक्त या सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज कराते हैं, तब भी प्रशासनिक तंत्र शिकायत को बिना उचित भौतिक जांच के ही बलपूर्वक बंद (Force Close) करने का कुचक्र रचता है। शिकायतकर्ताओं पर समझौते का दबाव बनाया जाता है।

यहां तक कि जनसंपर्क विभाग और अन्य जिम्मेदार अमला भी इन गंभीर घोटालों पर आंखें मूंदकर बैठा है। बार-बार सबूत और दस्तावेजों के साथ अनियमितताएं सामने लाने के बावजूद यदि जनसंपर्क या प्रशासन कोई सुध नहीं लेता, तो जनता यह सोचने पर मजबूर हो जाती है कि क्या ये अधिकारी सिर्फ इसलिए बैठे हैं ताकि जनता के टैक्स के पैसों को डकारा जाए और गरीबों का हक मारा जाए?

सबसे बड़ा और ज्वलंत प्रश्न यह है कि पिछले इन तमाम वर्षों में जिले के भीतर इतने बड़े वित्तीय घोटालों के बावजूद आज तक कोई भी मुख्य दोषी अधिकारी, इंजीनियर, सरपंच या सचिव जेल की सलाखों के पीछे क्यों नहीं पहुंचा? किसी की संपत्ति की कुर्की क्यों नहीं हुई? क्या प्रशासनिक अमला इसलिए बैठा है कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जाए?

कानूनी शिकंजा और नियमानुसार अपेक्षित कार्रवाई

यदि इन मामलों की निष्पक्ष न्यायिक या उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, तो नियमों और अधिनियमों के तहत निम्नलिखित सख्त कार्रवाई का प्रावधान है, जो कागजों तक सीमित न रहकर धरातल पर दिखनी चाहिए थी:

म.प्र. पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 के तहत:

धारा 40: भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितता में लिप्त सरपंच/पदाधिकारियों को तत्काल प्रभाव से पद से पृथक किया जाना चाहिए था।

धारा 89 एवं 92: गबन की गई संपूर्ण राशि की भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूली (Recovery) और राशि जमा न होने पर सिविल जेल व कुर्की के आदेश दिए जाने चाहिए थे, जो आज दिनांक तक धरातल पर क्रियान्वित नहीं हुए हैं।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के तहत:

धारा 316 BNS (पूर्व IPC 409): लोक सेवकों द्वारा आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) के तहत आजीवन कारावास या 10 साल तक की सजा व जुर्माने का प्रावधान है।

धारा 318 BNS (पूर्व IPC 420): धोखाधड़ी और कूटरचित बिलों के माध्यम से शासन को धोखा देने पर सख्त सजा।

धारा 336/338 BNS (पूर्व IPC 467/468): फर्जी दस्तावेज और बिल तैयार करने पर गंभीर जालसाजी का मामला।

धारा 61 BNS (पूर्व IPC 120B): सरपंच, सचिव, सप्लायर और भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत पर आपराधिक षड्यंत्र की धारा।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988:

धारा 13(1)(d) एवं 13(2): पद का दुरुपयोग कर अवैध वित्तीय लाभ कमाने पर लोकायुक्त/ईओडब्ल्यू के तहत सीधी गिरफ्तारी व कठोर कारावास।

निष्कर्ष एवं अंतिम चेतावनी

यह इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट शासन-प्रशासन के माथे पर एक स्पष्ट कलंक की तरह है, जो यह पूछने के लिए मजबूर करती है कि क्या नर्मदापुरम जिले में कानून का राज खत्म हो चुका है? यदि इन पुख्ता दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर जिला प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से एसआईटी (SIT) जांच बैठाकर लिप्त अधिकारियों, इंजीनियरों, सचिवों और सरपंचों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी व कुर्की की कार्रवाई नहीं की, तो यह माना जाएगा कि पूरा प्रशासनिक ढांचा इस भ्रष्टाचार में बराबर का हिस्सेदार है।

अब देखना यह है कि कुंभकर्णी नींद में सोए बैठे उच्च प्रशासनिक अधिकारी इस खुलासे के बाद अपनी आंखें खोलते हैं या फिर भ्रष्टाचार के इस खेल को यूं ही संरक्षण देते रहते हैं।

पत्रकार dayaram kushwaha +919407575388

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