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पिपरिया से निकले प्रेम सागर पांडे आस्था की राह में साष्टांग दंडवत, रोज 4-5 किमी की कठिन साधना

 

पिपरिया से निकले प्रेम सागर पांडे आस्था की राह में साष्टांग दंडवत, रोज 4-5 किमी की कठिन साधना 


52-48 शक्तिपीठों की पदयात्रा और 4 नर्मदा पदपरिक्रमा के बाद अब दंडवत यात्रा पर निकले प्रेमसागर पांडे

छगन कुशवाहा 


  1. पिपरिया । आज सुबह के समय,पिपरिया से प्रेम सागर पांडे माँ नर्मदा को साष्टांग दंडवत यात्रा करते नजर आये वर्तालाप के दौरान ऐ जानकारी खबर आजतक24.काम को www.khabaraajtak24.com दी।

मां नर्मदा नदी के तट पर आध्यात्मिक वातावरण और जमीन पर साष्टांग दंडवत करते हुए आगे बढ़ते प्रेमसागर पांडे। यह दृश्य मन में श्रद्धा जगाता है, तो साथ ही एक सवाल भी छोड़ जाता है कि आखिर आस्था की इस राह में इतनी कठिन तपस्या क्यों? क्या आध्यात्मिकता की मंजिल तक पहुंचने के लिए शरीर को इस हद तक कष्ट देना जरूरी है? प्रेमसागर पांडे के लिए यह केवल यात्रा नहीं, बल्कि मां नर्मदा के प्रति समर्पण और साधना का अनूठा संकल्प है।


मंडला-डिंडोरी क्षेत्र से मां नर्मदा की साष्टांग दंडवत परिक्रमा पर निकले प्रेमसागर पांडे इससे पहले 51 शक्तिपीठों की पदयात्रा कर चुके हैं। वे मां नर्मदा की सामान्य पदपरिक्रमा भी पूरी कर चुके हैं। अब उन्होंने कठिन साधना का रास्ता चुना है। इस यात्रा में वे प्रतिदिन करीब 4 से 5 किलोमीटर तक साष्टांग दंडवत करते हुए आगे बढ़ रहे हैं।


हाथ, सीने और पेट पर पड़ रहे छाले, फिर भी नहीं डगमगा रहा संकल्प


इस यात्रा की कठिनाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जमीन पर बार-बार साष्टांग दंडवत करने के कारण उनके हाथों, सीने और पेट पर छाले पड़ रहे हैं। कई बार छाले फूट भी जाते हैं। इसके बावजूद वे अपनी यात्रा जारी रखे हुए हैं। छालों पर लगाने के लिए वे अपने साथ बोरोप्लस भी रख रहे हैं।


प्रेमसागर पांडे अपने साथ चंदन की लकड़ी का करीब आठ इंच का टुकड़ा लेकर चल रहे हैं। यह लकड़ी उनकी इस विशेष दंडवत परिक्रमा का हिस्सा है। सीमित सामान, कम वस्त्र और कमंडल में पीने का पानी लेकर वे मां नर्मदा की परिक्रमा में जुटे हैं।


कठिन तपस्या या अटूट समर्पण?


प्रेमसागर की यह यात्रा केवल शारीरिक क्षमता की परीक्षा नहीं है, बल्कि आस्था, संकल्प और सहनशीलता का भी उदाहरण है। एक ओर उनके इस प्रयास को मां नर्मदा के प्रति अगाध श्रद्धा के रूप में देखा जा सकता है, तो दूसरी ओर यह विचार भी स्वाभाविक है कि आध्यात्मिकता का रास्ता क्या केवल कठिन तपस्या से ही होकर गुजरता है?


क्या यह साधना मन को मां नर्मदा के और करीब ले जाने का माध्यम है, या कठिनाइयों को सहने की अपनी क्षमता को परखने का प्रयास? इन सवालों के जवाब प्रेमसागर पांडे की अपनी आस्था और साधना में छिपे हैं। इतना जरूर है कि उनकी दंडवत परिक्रमा लोगों को श्रद्धा, त्याग और आध्यात्मिकता के अलग-अलग अर्थों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।


मां नर्मदा के प्रति समर्पण की यह यात्रा आसान नहीं है। शरीर पर पड़ते छाले और रोज जमीन पर दंडवत करते हुए तय किया जाने वाला रास्ता उनके संकल्प की कठिन परीक्षा ले रहा है। अब यह यात्रा कहां तक पहुंचेगी, यह समय बताएगा, लेकिन प्रेमसागर पांडे ने अपनी साधना से आस्था और तपस्या के बीच के रिश्ते पर एक नई चर्चा जरूर छेड़ दी है।





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